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उनके जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता (या रेणुका) को उनका जन्मस्थान मानते हैं, जबकि अन्य दिल्ली के पास सीही गाँव को मानते हैं।

उनकी मृत्यु सन् 1583 ई. (संवत् 1640 वि.) में गोवर्धन के पास पारसौली नामक गाँव में हुई।

वे जन्म से अंधे थे या बाद में हुए, इस पर भी अलग-अलग राय है। उनकी रचनाओं में कृष्ण की बाल-लीलाओं का सूक्ष्म वर्णन देखकर कई विद्वान मानते हैं कि वे जन्म से अंधे नहीं रहे होंगे।

उनके गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य थे, जिनसे उनकी भेंट मथुरा के गऊघाट पर हुई थी। उनके प्रभाव में आकर सूरदास जी कृष्ण-लीला का गान करने लगे。