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ऐसे लोक गीत अक्सर ग्रामीण अंचलों में महिलाओं द्वारा ढोलक और मंजीरों की थाप पर गाए जाते हैं। ये गीत हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। 'भक्ति' श्रेणी में होने के कारण, ये केवल एक उत्सव का गान नहीं हैं, बल्कि भगवान राम के जीवन प्रसंगों को आम आदमी के जीवन से जोड़ने का एक माध्यम भी हैं।
"राजा दशरथ फूले न समाए" मात्र एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों की वह गूँज है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। यह गीत सिखाता है कि परिवार में आने वाली खुशियाँ और मांगलिक अवसर किस प्रकार पूरे वातावरण को भक्ति और आनंद से सराबोर कर देते हैं।
यह पंक्ति मुख्य रूप से 'तिलक' के उत्सव से जुड़ी है। जब किसी शुभ कार्य की शुरुआत होती है या विवाह का संबंध पक्का होता है, तो घर के बड़े-बुजुर्गों का हृदय खुशी से भर जाता है। यहाँ राजा दशरथ का "फूले न समाना" (अत्यधिक प्रसन्न होना) एक पिता के उसी गौरव और संतोष को दिखाता है।
यह पंक्तियाँ उत्तर भारत के पारंपरिक लोक गीतों (Sohar or Tilak songs) का हिस्सा हैं, जो भगवान राम के जन्म या उनके विवाह (तिलक उत्सव) की खुशी को दर्शाती हैं।
क्या आप इस गीत के या इसके संगीत पक्ष के बारे में कुछ और जानना चाहेंगे?
'तिलक' का आंगन में आना इस बात का प्रतीक है कि रघुवंश की मर्यादा और खुशियाँ अब अगले पड़ाव पर हैं। भक्त कवि ने इसमें राजा दशरथ की मानवीय भावनाओं और ईश्वर (राम) के प्रति उनके प्रेम का अनूठा संगम प्रस्तुत किया है।