भारतेंदु युग वह सेतु है जिसने हिंदी साहित्य को मध्यकाल की श्रृंगारिकता से निकालकर आधुनिक काल की वास्तविकता और राष्ट्रीयता से मिलाया। इसी युग में हिंदी पत्रकारिता और नाटक जैसी विधाओं का वास्तविक विकास हुआ।

साहित्य में केवल राजा-रानियों की कहानियाँ नहीं, बल्कि बाल-विवाह, छुआछूत, सती प्रथा और नारी शिक्षा जैसे सामाजिक मुद्दों पर खुलकर लिखा गया।

पद्य (कविता) के लिए ब्रजभाषा का प्रयोग जारी रहा, लेकिन गद्य (Prose) के लिए खड़ी बोली को अपनाया गया, जो जनता की समझ में आसानी से आ सके।

भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, प्रेम मालिका, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

इस युग के कवियों ने देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति पर बल दिया। अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाना और भारतीयों में गौरव जगाना प्रमुख लक्ष्य था।

इस काल में संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला के प्रसिद्ध ग्रंथों का हिंदी में बड़े स्तर पर अनुवाद हुआ, जिससे हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ।